श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 71: अतिकाय का भयंकर युद्ध और लक्ष्मण के द्वारा उसका वध  »  श्लोक 53
 
 
श्लोक  6.71.53 
सुखप्रसुप्तं कालाग्निं विबोधयितुमिच्छसि।
न्यस्य चापं निवर्तस्व प्राणान्न जहि मद‍्गत:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
तू सुखपूर्वक सोई हुई विनाश अग्नि को क्यों जगाना चाहता है? धनुष यहीं छोड़कर लौट जा। मुझसे युद्ध करके अपने प्राण न त्याग॥ 53॥
 
‘Why do you wish to awaken the fire of destruction which is comfortably asleep? Leave the bow here and return. Do not sacrifice your life by fighting with me.॥ 53॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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