श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 71: अतिकाय का भयंकर युद्ध और लक्ष्मण के द्वारा उसका वध  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  6.71.52 
नहि मद‍्बाहुसृष्टानां बाणानां हिमवानपि।
सोढुमुत्सहते वेगमन्तरिक्षमथो मही॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
मेरे हाथों से छोड़े हुए बाणों का वेग विशाल हिमालय भी नहीं सह सकता। पृथ्वी और आकाश भी उसे सहन नहीं कर सकते॥ 52॥
 
‘Even the mighty Himalayas cannot bear the speed of the arrows shot from my hands. Even the earth and the sky cannot bear it.॥ 52॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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