श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 71: अतिकाय का भयंकर युद्ध और लक्ष्मण के द्वारा उसका वध  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  6.71.45 
रथे स्थितोऽहं शरचापपाणि-
र्न प्राकृतं कंचन योधयामि।
यस्यास्ति शक्तिर्व्यवसाययुक्तो
ददातु मे शीघ्रमिहाद्य युद्धम्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
मैं धनुष-बाण लेकर रथ पर बैठा हूँ। मैं किसी साधारण प्राणी से युद्ध नहीं करना चाहता। जिसमें भी बल, साहस और उत्साह हो, वह शीघ्र ही यहाँ आकर मुझे युद्ध करने का अवसर दे।॥45॥
 
‘I am sitting on a chariot with my bow and arrow. I do not wish to fight with any ordinary creature. Whoever has strength, courage and enthusiasm should come here soon and give me a chance to fight.’॥ 45॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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