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श्लोक 6.71.12  |
कोऽसौ पर्वतसंकाशो धनुष्मान् हरिलोचन:।
युक्ते हयसहस्रेण विशाले स्यन्दने स्थित:॥ १२॥ |
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| अनुवाद |
| 'विभीषण! वह पर्वत के समान विशाल राक्षस, जो एक हजार घोड़ों से जुते हुए विशाल रथ पर बैठा है, कौन है? उसके हाथ में धनुष है और उसके नेत्र सिंह के समान चमक रहे हैं॥ 12॥ |
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| ‘Vibhishana! Who is that mountain-like demon sitting on a huge chariot drawn by a thousand horses? He has a bow in his hand and his eyes appear as radiant as those of a lion.॥ 12॥ |
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