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श्लोक 6.71.110  |
तान्यायुधान्यद्भुतविग्रहाणि
मोघानि कृत्वा स शरोऽग्निदीप्त:।
प्रगृह्य तस्यैव किरीटजुष्टं
तदातिकायस्य शिरो जहार॥ ११०॥ |
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| अनुवाद |
| परंतु अग्नि के समान प्रज्वलित उस बाण ने उन अद्भुत अस्त्रों को निष्फल कर दिया और अतिकायका का मुकुटधारी सिर काट डाला ॥110॥ |
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| But that arrow, which lit up like fire, made those wonderful weapons useless and severed the crowned head of Atikayaka. 110॥ |
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