श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 70: हनुमान जी के द्वारा देवान्तक और त्रिशिरा का, नील के द्वारा महोदर का तथा ऋषभ के द्वारा महापार्श्व का वध  »  श्लोक 64-65h
 
 
श्लोक  6.70.64-65h 
अभिदुद्राव वेगेन गदां तस्य महात्मन:।
तां गृहीत्वा गदां भीमामाविध्य च पुन: पुन:॥ ६४॥
मत्तानीकं महात्मा स जघान रणमूर्धनि।
 
 
अनुवाद
उस समय उस राक्षस ने महाबुद्धिमान ऋषभ के हाथ से उसकी गदा छीनने के लिए उस पर आक्रमण किया; किन्तु ऋषभ ने उस भयंकर गदा को हाथ में लेकर बार-बार घुमाया और महापार्श्व पर बड़े जोर से प्रहार किया। इस प्रकार महाबुद्धिमान वानर योद्धा ने युद्ध के मुहाने पर ही उस राक्षस का अंत कर दिया।
 
At that time the demon attacked the great-minded Rishabha to take his mace from his hands; but Rishabha took that dreadful mace in his hand and swung it again and again and attacked Mahaparsva with great force. In this way the great-minded monkey warrior ended the life of that demon at the very mouth of the battle. 64 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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