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श्लोक 6.68.17  |
राज्येन नास्ति मे कार्यं किं करिष्यामि सीतया।
कुम्भकर्णविहीनस्य जीविते नास्ति मे मति:॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| अब मुझे राज्य में कोई रुचि नहीं रही। सीता को लेकर मैं क्या करूँगा? कुंभकर्ण के बिना मेरा मन नहीं लगता॥17॥ |
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| ‘Now I have no interest in the kingdom. What will I do with Sita? I don't feel like living without Kumbhakarna.॥ 17॥ |
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