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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 67: कम्भकर्ण का भयंकर युद्ध और श्रीराम के हाथ से उसका वध  »  श्लोक 103
 
 
श्लोक  6.67.103 
अथास्य कवचं शुभ्रं जाम्बूनदमयं शुभम्।
प्रच्छादयामास शरै: संध्याभ्रमिव मारुत:॥ १०३॥
 
 
अनुवाद
जैसे वायु संध्या के बादलों को उखाड़कर अदृश्य कर देती है, वैसे ही उसने कुम्भकर्ण के सुन्दर और चमकते हुए सोने के कवच को अपने बाणों से ढककर अदृश्य कर दिया॥103॥
 
He covered Kumbhakarna's beautiful and shining armour made of gold with his arrows and made it invisible, just as the wind uproots the evening clouds and makes them invisible.॥103॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)