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श्लोक 6.64.36  |
अनष्टसैन्यो ह्यनवाप्तसंशयो
रिपुं त्वयुद्धेन जयञ्जनाधिप:।
यशश्च पुण्यं च महान्महीपते
श्रियं च कीर्तिं च चिरं समश्नुते॥ ३६॥ |
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| अनुवाद |
| महाराज! जो राजा बिना युद्ध किए ही शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेता है, उसकी सेना कभी नष्ट नहीं होती। उसका जीवन भी कभी संदेह में नहीं रहता। वह पवित्र होकर महान यश प्राप्त करता है, तथा दीर्घकाल तक धन और महान कीर्ति का उपभोग करता है।॥ 36॥ |
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| ‘Maharaj! The king who conquers his enemy without a fight, his army is never destroyed. His life is also never in doubt. He becomes pure and gets great fame and enjoys wealth and great reputation for a long time.’॥ 36॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे चतु:षष्टितम: सर्ग: ॥ ६ ४॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें चौंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६ ४॥ |
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