श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 64: महोदर का कुम्भकर्ण के प्रति आक्षेप करके रावण को बिना युद्ध के ही अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति का उपाय बताना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  6.64.34 
सा पुरा सुखसंवृद्धा सुखार्हा दु:खकर्शिता।
त्वय्यधीनं सुखं ज्ञात्वा सर्वथैव गमिष्यति॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
'वह सुख-सुविधाओं में पली है और सुख-सुविधाओं का उपभोग करने में समर्थ है; किन्तु इन दिनों दुःख के कारण दुर्बल हो गई है। ऐसी दशा में अब वह अपना सुख पूर्णतः आप पर ही निर्भर समझेगी और पूर्णतः आपकी सेवा में आ जाएगी॥ 34॥
 
‘She has been brought up in comfort and is capable of enjoying comfort; but these days she has become weak due to sadness. In such a condition, she will now consider her comfort to be completely dependent on you and will come to your service completely.॥ 34॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd