श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 63: कुम्भकर्ण का रावण को उसके कुकृत्यों के लिये उपालम्भ देना और उसे धैर्य बँधाते हुए युद्धविषयक उत्साह प्रकट करना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  6.63.9 
धर्ममर्थं हि कामं वा सर्वान् वा रक्षसां पते।
भजेत पुरुष: काले त्रीणि द्वन्द्वानि वा पुन:॥ ९॥
 
 
अनुवाद
हे दैत्यराज! बुद्धिमान मनुष्य को या तो धर्म, अर्थ या काम का उचित समय पर आनंद लेना चाहिए अथवा धर्म-अर्थ, अर्थ-धर्म और काम-अर्थ - इन तीनों द्वंद्वों का उचित समय पर आनंद लेना चाहिए।
 
King of demons! A wise man should either enjoy Dharma, Artha or Kama at the right time or he should enjoy all the three conflicts - Dharma-Artha, Artha-Dharma and Kama-Artha at the right time.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)