श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 63: कुम्भकर्ण का रावण को उसके कुकृत्यों के लिये उपालम्भ देना और उसे धैर्य बँधाते हुए युद्धविषयक उत्साह प्रकट करना  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक  6.63.42 
कामं त्विदानीमपि मां व्यादिश त्वं परंतप।
न पर: प्रेक्षणीयस्ते युद्धायातुलविक्रम॥ ४२॥
 
 
अनुवाद
हे शत्रुओं को संताप देने वाले अतुलनीय पराक्रमी योद्धा! इस समय आप मुझे अपनी इच्छानुसार युद्ध करने की आज्ञा दे सकते हैं। शत्रुओं से युद्ध करने के लिए आपको किसी अन्य की ओर देखने की आवश्यकता नहीं है।॥42॥
 
O incomparable valiant warrior who torments the enemies! At this time, you can order me to fight as per your wish. You do not need to look towards anyone else to fight the enemies. ॥ 42॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)