श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 63: कुम्भकर्ण का रावण को उसके कुकृत्यों के लिये उपालम्भ देना और उसे धैर्य बँधाते हुए युद्धविषयक उत्साह प्रकट करना  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  6.63.24 
विभ्रमाच्चित्तमोहाद् वा बलवीर्याश्रयेण वा।
नाभिपन्नमिदानीं यद् व्यर्था तस्य पुन: कथा॥ २४॥
 
 
अनुवाद
इस समय इस बात की पुनः चर्चा करना व्यर्थ है कि मैंने पहले भ्रम, मोह अथवा अपने बल के भरोसे आपकी बात नहीं मानी थी॥ 24॥
 
It is useless to discuss again at this time the fact that I did not obey you earlier due to confusion, infatuation or reliance on my own strength.॥ 24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)