श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 62: कुम्भकर्ण का रावण के भवन में प्रवेश तथा रावण का राम से भय बताकर उसे शत्रुसेना के विनाश के लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  6.62.2 
राक्षसानां सहस्रैश्च वृत: परमदुर्जय:।
गृहेभ्य: पुष्पवर्षेण कीर्यमाणस्तदा ययौ॥ २॥
 
 
अनुवाद
वह परम अजेय योद्धा सहस्त्रों राक्षसों से घिरा हुआ चल रहा था। मार्ग के किनारे के घर उस पर पुष्प वर्षा कर रहे थे॥2॥
 
That most invincible warrior was travelling surrounded by thousands of demons. The houses on the roadside were showering flowers on him.॥2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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