|
| |
| |
श्लोक 6.61.34  |
विभीषणवच: श्रुत्वा हेतुमत् सुमुखोद्गतम्।
उवाच राघवो वाक्यं नीलं सेनापतिं तदा॥ ३४॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| विभीषण के सुन्दर मुख से निकले हुए ये ज्ञानपूर्ण वचन सुनकर श्री रघुनाथजी ने सेनापति नील से कहा-॥ |
| |
| Hearing these wise words coming from the beautiful mouth of Vibhishana, Shri Raghunath ji said to Commander Neel – ॥ |
| ✨ ai-generated |
| |
|