श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 61: विभीषण का श्रीराम को कुम्भकर्ण का परिचय देना, श्रीराम की आज्ञा से वानरों का लङ्का के द्वारों पर डट जाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  6.61.17 
तत: क्रुद्धो महेन्द्रस्य कुम्भकर्णो महाबल:।
निष्कृष्यैरावताद् दन्तं जघानोरसि वासवम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् महाबली कुम्भकर्ण ने क्रोधित होकर इन्द्र के ऐरावत के मुख से एक दाँत उखाड़ लिया और उसी से देवेन्द्र की छाती पर प्रहार किया॥17॥
 
‘Thereafter the mighty Kumbhakarna became enraged and plucked out a tooth from the mouth of Indra's Airavat and struck Devendra on his chest with the same.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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