श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 61: विभीषण का श्रीराम को कुम्भकर्ण का परिचय देना, श्रीराम की आज्ञा से वानरों का लङ्का के द्वारों पर डट जाना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  6.61.14 
तेषु सम्भक्ष्यमाणेषु प्रजा भयनिपीडिता:।
यान्त स्म शरणं शक्रं तमप्यर्थं न्यवेदयन्॥ १४॥
 
 
अनुवाद
जब हजारों प्रजाएँ उसका आहार बनने लगीं, तब वे सब-की-सब भय से पीड़ित होकर देवराज इन्द्र की शरण में गईं और उनसे सबने अपना-अपना दुःख कहा॥14॥
 
When thousands of subjects started becoming its food, then all of them, afflicted with fear, went to the shelter of Devaraj Indra and all of them explained their suffering to him.॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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