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श्लोक 6.60.58  |
तस्य जाजृम्भमाणस्य वक्त्रं पातालसंनिभम्।
ददृशे मेरुशृङ्गाग्रे दिवाकर इवोदित:॥ ५८॥ |
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| अनुवाद |
| जम्हाई लेते समय कुंभकर्ण का पाताल-सा मुख मेरु पर्वत के शिखर पर उगते हुए सूर्य के समान प्रतीत हो रहा था। 58. |
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| While yawning, Kumbhakarna's underworld-like face looked like the sun rising on the peak of Mount Meru. 58. |
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