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ramayan 6.60.57: उसकी दोनों भुजाएँ सर्पों और पर्वत शिखरों के समान प्रतीत हो रही थीं। उन्होंने वज्र की शक्ति को परास्त कर दिया था। जब उस रात्रि-राक्षस ने अपनी दोनों भुजाएँ और मुख फैलाकर जम्हाई लेना शुरू किया, तो उसका मुख प्रचण्ड अग्नि के समान प्रचण्ड लग रहा था।   |   ramayan सर्ग 6.60: अपनी पराजय से दुःखी रावण की आज्ञा से सोये कुम्भकर्ण का जगाया जाना और उसे देखकर वानरों का भयभीत होना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 60: अपनी पराजय से दुःखी रावण की आज्ञा से सोये कुम्भकर्ण का जगाया जाना और उसे देखकर वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 57
 
 
श्लोक  6.60.57 
स नागभोगाचलशृङ्गकल्पौ
विक्षिप्य बाहू जितवज्रसारौ।
विवृत्य वक्त्रं वडवामुखाभं
निशाचरोऽसौ विकृतं जजृम्भे॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
उसकी दोनों भुजाएँ सर्पों और पर्वत शिखरों के समान प्रतीत हो रही थीं। उन्होंने वज्र की शक्ति को परास्त कर दिया था। जब उस रात्रि-राक्षस ने अपनी दोनों भुजाएँ और मुख फैलाकर जम्हाई लेना शुरू किया, तो उसका मुख प्रचण्ड अग्नि के समान प्रचण्ड लग रहा था।
 
His both arms looked like the bodies of serpents and mountain peaks. They had defeated the power of the thunderbolt. When that night-demon spread his both arms and mouth and started yawning, his face looked as fierce as a great fire.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)