श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 60: अपनी पराजय से दुःखी रावण की आज्ञा से सोये कुम्भकर्ण का जगाया जाना और उसे देखकर वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  6.60.40 
तं शैलशृङ्गैर्मुसलैर्गदाभि-
र्वक्ष:स्थले मुद‍्गरमुष्टिभिश्च।
सुखप्रसुप्तं भुवि कुम्भकर्णं
रक्षांस्युदग्राणि तदा निजघ्नु:॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
कुम्भकर्ण भूतल पर सुखपूर्वक सो रहा था। उसी अवस्था में वे क्रूर राक्षस उसकी छाती पर पर्वतीय भालों, मूसलों, गदाओं, गदाओं और मुट्ठियों से प्रहार करने लगे ॥40॥
 
Kumbhakarna was sleeping happily on the ground floor. In that very state, those ferocious demons started hitting his chest with mountain spears, pestles, maces, clubs and fists. 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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