श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 60: अपनी पराजय से दुःखी रावण की आज्ञा से सोये कुम्भकर्ण का जगाया जाना और उसे देखकर वानरों का भयभीत होना  »  श्लोक 13-14h
 
 
श्लोक  6.60.13-14h 
स चाप्रतिमगाम्भीर्यो देवदानवदर्पहा॥ १३॥
ब्रह्मशापाभिभूतस्तु कुम्भकर्णो विबोध्यताम्।
 
 
अनुवाद
इसके साथ ही, जिसका गाम्भीर्य अद्वितीय है, जो देवताओं और दानवों का अभिमान चूर करता है, तथा जो ब्रह्माजी के शाप से उत्पन्न निद्रा से सदैव अभिभूत रहता है, उस कुम्भकर्ण को भी जगाया जाए।॥13 1/2॥
 
Along with this Kumbhakarna, whose seriousness is unparalleled, who crushes the pride of gods and demons, and who is always overwhelmed by the sleep caused by the curse of Brahma, should also be awakened.'॥ 13 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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