श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 59: प्रहस्त की मृत्यु से दुःखी रावण का युद्ध के लिये पधारना, लक्ष्मण का युद्ध में आना, श्रीराम से परास्त होकर रावण का लङ्का जाना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  6.59.25 
असौ किरीटी चलकुण्डलास्यो
नगेन्द्रविन्ध्योपमभीमकाय:।
महेन्द्रवैवस्वतदर्पहन्ता
रक्षोधिप: सूर्य इवावभाति॥ २५॥
 
 
अनुवाद
वह मस्तक पर मुकुट धारण किए हुए है। उसके मुख पर झूलते हुए कुण्डल सुशोभित हैं। उसका शरीर हिमालय और विंध्याचल पर्वत के समान विशाल और भयंकर है तथा वह इंद्र और यमराज का भी अभिमान चूर करने में समर्थ है। देखो, यह दैत्यराज स्वयं सूर्य के समान चमक रहा है।॥25॥
 
‘He is wearing a crown on his head. His face is adorned with swinging earrings. His body is huge and fearsome like the Himalayas and Vindhyachal mountains and he is capable of shattering the pride of even Indra and Yamraj. Look, this demon king is shining like the Sun himself.’॥ 25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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