श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 59: प्रहस्त की मृत्यु से दुःखी रावण का युद्ध के लिये पधारना, लक्ष्मण का युद्ध में आना, श्रीराम से परास्त होकर रावण का लङ्का जाना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  6.59.18 
योऽसौ हयं काञ्चनचित्रभाण्ड-
मारुह्य संध्याभ्रगिरिप्रकाशम्।
प्रासं समुद्यम्य मरीचिनद्धं
पिशाच एषोऽशनितुल्यवेग:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जो स्वर्णमय आभूषणों से विभूषित, संध्या के मेघों के समान पर्वत की आभा वाले घोड़े पर सवार होकर, हाथ में चमकता हुआ भाला लिए हुए इस ओर आ रहा है, वह पिशाच कहलाता है। वह वज्र के समान तेज योद्धा है॥18॥
 
The one who is coming this way riding a horse adorned with golden ornaments and having the aura of a mountain like the evening clouds, holding a shining spear in his hand, is called Pisaach. He is a warrior as fast as a thunderbolt.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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