श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 59: प्रहस्त की मृत्यु से दुःखी रावण का युद्ध के लिये पधारना, लक्ष्मण का युद्ध में आना, श्रीराम से परास्त होकर रावण का लङ्का जाना  »  श्लोक 141
 
 
श्लोक  6.59.141 
तं निर्विषाशीविषसंनिकाशं
शान्तार्चिषं सूर्यमिवाप्रकाशम्।
गतश्रियं कृत्तकिरीटकूट-
मुवाच रामो युधि राक्षसेन्द्रम्॥ १४१॥
 
 
अनुवाद
उस समय धनुष के न रहने से रावण विषरहित सर्प के समान अपनी शक्ति खो बैठा था। वह संध्याकाल में फीकी पड़ जाने वाले सूर्यदेव के समान मंद हो गया था और मुकुटों के नष्ट हो जाने से वह कीर्तिहीन हो गया था। उस अवस्था में श्री राम ने युद्धभूमि में राक्षसराज से कहा -॥141॥
 
At that time, due to the absence of the bow, Ravana had lost his power like a snake without poison. He had become as dull as the Sun God whose radiance has faded in the evening and due to the loss of his crowns, he looked bereft of glory. In that condition, Shri Ram said to the demon king on the battlefield -॥141॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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