श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 59: प्रहस्त की मृत्यु से दुःखी रावण का युद्ध के लिये पधारना, लक्ष्मण का युद्ध में आना, श्रीराम से परास्त होकर रावण का लङ्का जाना  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  6.59.105 
स लक्ष्मणो रावणसायकार्त-
श्चचाल चापं शिथिलं प्रगृह्य।
पुनश्च संज्ञां प्रतिलभ्य कृच्छ्रा-
च्चिच्छेद चापं त्रिदशेन्द्रशत्रो:॥ १०५॥
 
 
अनुवाद
रावण के उस बाण से घायल होकर लक्ष्मण जी व्याकुल हो गए। उनके हाथ में जो धनुष था, वह उनकी मुट्ठी में ढीला पड़ गया। तब उन्होंने बड़ी कठिनाई से होश संभाला और देवताओं के शत्रु रावण के धनुष को काट डाला॥105॥
 
Lakshman ji was disturbed after being hit by that arrow of Ravana. The bow which he was holding in his hand became loose in his fist. Then he regained his senses with great difficulty and cut the bow of Ravana who was the enemy of gods.॥ 105॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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