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श्लोक 6.58.17  |
आर्तस्वनं च स्वनतां सिंहनादं च नर्दताम्।
बभूव तुमुल: शब्दो हरीणां रक्षसामपि॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| कोई तो पीड़ा से चिल्ला रहे थे, कोई सिंह के समान दहाड़ रहे थे। इस प्रकार वानरों और राक्षसों का भयंकर कोलाहल सर्वत्र गूंज रहा था॥17॥ |
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| Some were crying in pain while others were roaring like lions. In this way the terrible uproar of the monkeys and demons echoed everywhere.॥ 17॥ |
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