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श्लोक 6.56.19  |
तं पर्वताग्रमाकाशे रक्षोबाणविदारितम्।
विकीर्णं पतितं दृष्ट्वा हनूमान् क्रोधमूिर्च्छत:॥ १९॥ |
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| अनुवाद |
| उस राक्षस के बाण से वह पर्वत शिखर छिन्न-भिन्न होकर आकाश में गिर पड़ा। यह देखकर हनुमानजी के क्रोध की सीमा न रही। |
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| That mountain peak was pierced by the arrow of that demon and fell in the sky. Seeing this Hanuman's anger knew no bounds. |
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