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श्लोक 6.52.38  |
स तु पवनसुतो निहत्य शत्रून्
क्षतजवहा: सरितश्च संविकीर्य।
रिपुवधजनितश्रमो महात्मा
मुदमगमत् कपिभि: सुपूज्यमान:॥ ३८॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार शत्रुओं का संहार करके तथा रक्त से अनेक नदियाँ बहाकर महात्मा पवनकुमार हनुमान् यद्यपि शत्रुओं के संहार के कठिन परिश्रम से थक गए थे, तथापि वानरों द्वारा पूजित और स्तुति पाकर वे अत्यन्त प्रसन्न हुए ॥38॥ |
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| Thus, after killing the enemies and making many rivers flow with blood, even though Mahatma Pawankumar Hanuman was tired of the hard work of killing enemies, yet he felt very happy on being worshiped and praised by the monkeys. 38॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे द्विपञ्चाश: सर्ग: ॥ ५ २॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें बावनवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५ २॥ |
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