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ramayan 6.5.6: हे पवन! तुम जहाँ मेरी प्रियतमा हो, वहाँ बहो। उसे स्पर्श करने के बाद, मुझे भी स्पर्श करो। उस स्थिति में, तुम्हारे द्वारा मेरे अंगों का स्पर्श मेरे सभी दुःखों को दूर कर देगा और मुझे चन्द्रमा से नेत्र-संपर्क के समान आनंद प्रदान करेगा। ॥6॥   |   ramayan सर्ग 6.5: श्रीराम का सीता के लिये शोक और विलाप   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 5: श्रीराम का सीता के लिये शोक और विलाप  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  6.5.6 
वाहि वात यत: कान्ता तां स्पृष्ट्वा मामपि स्पृश।
त्वयि मे गात्रसंस्पर्शश्चन्द्रे दृष्टिसमागम:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
हे पवन! तुम जहाँ मेरी प्रियतमा हो, वहाँ बहो। उसे स्पर्श करने के बाद, मुझे भी स्पर्श करो। उस स्थिति में, तुम्हारे द्वारा मेरे अंगों का स्पर्श मेरे सभी दुःखों को दूर कर देगा और मुझे चन्द्रमा से नेत्र-संपर्क के समान आनंद प्रदान करेगा। ॥6॥
 
Wind! You flow where my beloved is. After touching her, touch me too. In that condition, the touch of my body parts by you will remove all my sorrows and will be joyful, just like the eye contact with the moon. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)