श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 5: श्रीराम का सीता के लिये शोक और विलाप  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  6.5.4 
शोकश्च किल कालेन गच्छता ह्यपगच्छति।
मम चापश्यत: कान्तामहन्यहनि वर्धते ॥ ४ ॥
 
 
अनुवाद
सुमित्रानंदन! कहते हैं कि समय के साथ दुःख मिट जाता है; परंतु अपने प्रियतम के दर्शन न कर पाने के कारण मेरा दुःख दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है।
 
Sumitra Nandan! It is said that grief vanishes with the passage of time; but my grief is increasing day by day due to not being able to see my beloved.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd