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श्लोक 6.49.15  |
शयान: शरतल्पेऽस्मिन् सशोणितपरिस्रुत:।
शरभूतस्ततो भासि भास्करोऽस्तमिव व्रजन्॥ १५॥ |
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| अनुवाद |
| ‘इस बाणों की शय्या पर तुम रक्त से लथपथ पड़े हो और बाणों से घिरे हुए तुम अस्त होते हुए सूर्य के समान चमक रहे हो।॥15॥ |
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| ‘On this bed of arrows you are lying soaked in blood and surrounded by arrows you are shining like the setting sun.॥ 15॥ |
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