श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 49: श्रीराम का सचेत हो लक्ष्मण के लिये विलाप करना और स्वयं प्राणत्याग का विचार करके वानरों को लौट जाने की आज्ञा देना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  6.49.12 
धिङ्मां दुष्कृतकर्माणमनार्यं यत्कृते ह्यसौ।
लक्ष्मण: पतित: शेते शरतल्पे गतासुवत्॥ १२॥
 
 
अनुवाद
मुझ जैसे दुष्टों और असभ्यों को धिक्कार है, जिनके कारण लक्ष्मण बाणों की शय्या पर मरे हुए के समान सो रहे हैं।
 
Shame on the evil-doers and the uncivilized like me, because of whom Lakshmana is sleeping like a dead person on the bed of arrows.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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