श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 48: सीता का विलाप और त्रिजटा का उन्हें समझा-बुझाकर श्रीराम-लक्ष्मण के जीवित होने का विश्वास दिलाना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  6.48.29 
अनृतं नोक्तपूर्वं मे न च वक्ष्यामि मैथिलि।
चारित्रसुखशीलत्वात् प्रविष्टासि मनो मम॥ २९॥
 
 
अनुवाद
मिथिलेश कुमारी! तुम्हारा विनम्र स्वभाव तुम्हारे पवित्र चरित्र के कारण अत्यंत प्रिय लगता है, इसीलिए तुमने मेरे हृदय में स्थान बना लिया है। इसलिए मैंने न तो तुमसे पहले कभी झूठ बोला है और न ही भविष्य में बोलूँगा।
 
‘Mithilesh Kumari! Your modest nature seems very pleasing due to your pure character, that is why you have made a place in my heart. Therefore I have never told you a lie before nor will I tell you in future.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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