श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 48: सीता का विलाप और त्रिजटा का उन्हें समझा-बुझाकर श्रीराम-लक्ष्मण के जीवित होने का विश्वास दिलाना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  6.48.17 
अदृश्यमानेन रणे मायया वासवोपमौ।
मम नाथावनाथाया निहतौ रामलक्ष्मणौ॥ १७॥
 
 
अनुवाद
मेरे अनाथ के रक्षक श्री राम और लक्ष्मण इन्द्र के समान वीर थे, किन्तु इन्द्रजित ने माया से अदृश्य होकर स्वयं युद्धस्थल में उन्हें मार डाला॥17॥
 
The protectors of my orphan, Shri Ram and Lakshman were as brave as Indra, but Indrajit himself, by remaining invisible through illusion, killed them in the battlefield. 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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