|
| |
| |
श्लोक 6.46.50  |
स हर्षवेगानुगतान्तरात्मा
श्रुत्वा गिरं तस्य महारथस्य।
जहौ ज्वरं दाशरथे: समुत्थं
प्रहृष्टवाचाभिननन्द पुत्रम्॥ ५०॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| महारथी इन्द्रजित के वे वचन सुनकर रावण का हृदय हर्ष से भर गया। उसने दशरथनन्दन श्री राम से प्राप्त भय और चिन्ता को त्याग दिया और प्रसन्न वचनों से अपने पुत्र का स्वागत किया। |
| |
| Hearing those words of the great warrior Indrajit, Ravana's soul burst with joy. He abandoned the fear and worry that he had received from Dashrathanandan Shri Ram and greeted his son with happy words. 50॥ |
| |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे षट्चत्वारिंश: सर्ग: ॥ ४ ६॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें छियालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४ ६॥ |
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|