श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 44: रात में वानरों और राक्षसों का घोर युद्ध, अङ्गद के द्वारा इन्द्रजित की पराजय, इन्द्रजित द्वारा श्रीराम और लक्ष्मण को बाँधना  »  श्लोक 34-35h
 
 
श्लोक  6.44.34-35h 
सोऽन्तर्धानगत: पापो रावणी रणकर्शित:।
ब्रह्मदत्तवरो वीरो रावणि: क्रोधमूर्च्छित:॥ ३४॥
अदृश्यो निशितान् बाणान् मुमोचाशनिवर्चस:।
 
 
अनुवाद
रावण के पुत्र वीर इन्द्रजित को ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था। युद्ध में अपार कष्ट होने के कारण पापी रावण का पुत्र क्रोध से अचेत हो रहा था, अतः उसने अन्तर्धान विद्या का आश्रय लेकर अदृश्य होकर वज्र के समान तीक्ष्ण एवं उज्ज्वल बाणों की वर्षा आरम्भ कर दी।
 
Ravana's son, brave Indrajit had already received a boon from Lord Brahma. Due to the immense suffering in the war, the sinful son of Ravana was becoming unconscious out of anger; therefore, taking recourse to the knowledge of antardhan, he became invisible and started showering arrows as bright and sharp as thunderbolts.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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