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श्लोक 6.43.46  |
निहन्यमाना हरिपुङ्गवैस्तदा
निशाचरा: शोणितगन्धमूर्च्छिता:।
पुन: सुयुद्धं तरसा समाश्रिता
दिवाकरस्यास्तमयाभिकाङ्क्षिण:॥ ४६॥ |
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| अनुवाद |
| उस समय रात्रिचर जीव उन वानर-मुखधारी योद्धाओं द्वारा मारे जा रहे रक्त की गंध से मदहोश हो रहे थे। वे सूर्यास्त की प्रतीक्षा कर रहे थे और पुनः बड़े वेग से भीषण युद्ध के लिए तैयार हो रहे थे। |
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| At that time, the nocturnal creatures were getting intoxicated by the smell of blood being killed by those monkey-headed warriors. They waited for the sunset and again got ready for a fierce battle with great vigour. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे त्रिचत्वारिंश: स र्ग : ॥ ४ ३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें तैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४ ३॥ |
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