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श्लोक  6.40.27-28 
एतस्मिन्नन्तरे रक्षो मायाबलमथात्मन:।
आरब्धुमुपसम्पेदे ज्ञात्वा तं वानराधिप:॥ २७॥
उत्पपात तदाऽऽकाशं जितकाशी जितक्लम:।
रावण: स्थित एवात्र हरिराजेन वञ्चित:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
इस बीच, राक्षस रावण ने अपनी मायावी शक्तियों का प्रयोग करने की सोची। वानरराज सुग्रीव को यह बात समझ में आ गई, इसलिए वह अचानक आकाश में उछल पड़ा। वह विजय के उल्लास से विभूषित था और अपनी थकान पर विजय पा चुका था। वानरराज रावण को धोखा देकर भाग निकला और वह खड़ा देखता रह गया।
 
Meanwhile, the demon Ravana thought of using his magical powers. The monkey king Sugreeva understood this; therefore, suddenly he jumped into the sky. He was adorned with the joy of victory and had overcome his fatigue. The monkey king deceived Ravana and escaped and he kept standing and watching.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)