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श्लोक 6.4.77-78  |
गिरिप्रस्थेषु रम्येषु सर्वत: सम्प्रपुष्पिता:॥ ७७॥
केतक्य: सिन्दुवाराश्च वासन्त्यश्च मनोरमा:।
माधव्यो गन्धपूर्णाश्च कुन्दगुल्माश्च पुष्पिता:॥ ७८॥ |
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| अनुवाद |
| सुन्दर पर्वत शिखरों पर खिली हुई केतकी, सिन्धुवार और वासंती लताएँ बड़ी मनमोहक लग रही थीं। खिली हुई माधवी लताएँ सुगन्ध से भरी हुई थीं और कुंदा की झाड़ियाँ भी फूलों से लदी हुई थीं। |
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| The Ketaki, Sinduwar and Vasanti creepers blooming all over the beautiful mountain peaks looked very enchanting. The blooming Madhavi creepers were full of fragrance and the Kunda bushes were also laden with flowers. |
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