श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 4: श्रीराम आदि के साथ वानर-सेना का प्रस्थान और समुद्र-तट पर उसका पड़ाव  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  6.4.7 
उपरिष्टाद्धि नयनं स्फुरमाणमिमं मम।
विजयं समनुप्राप्तं शंसतीव मनोरथम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
इसके अतिरिक्त मेरी दाहिनी आँख का ऊपरी भाग फड़क रहा है। ऐसा भी प्रतीत होता है, मानो यह मेरी विजय और मेरी मनोकामनाओं की पूर्ति का संकेत दे रहा है।॥7॥
 
‘Apart from this, the upper part of my right eye is twitching. It also seems as if it is indicating my victory and the fulfillment of my desires.’॥ 7॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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