श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 4: श्रीराम आदि के साथ वानर-सेना का प्रस्थान और समुद्र-तट पर उसका पड़ाव  »  श्लोक 51
 
 
श्लोक  6.4.51 
नैर्ऋतं नैर्ऋतानां च नक्षत्रमतिपीडॺते।
मूलो मूलवता स्पृष्टो धूप्यते धूमकेतुना॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
दैत्यों का तारा, जिसका देवता निरऋति है, बहुत दुःख भोग रहा है। उस मूल के नियंत्रक धूमकेतु द्वारा आक्रांत होकर वह दुःख भोग रहा है॥ 51॥
 
‘The star of the demons, whose deity is Nirriti, is suffering a lot. Being attacked by the comet, which is the controller of that root, it is suffering misery.॥ 51॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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