| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 6: युद्ध काण्ड » सर्ग 4: श्रीराम आदि के साथ वानर-सेना का प्रस्थान और समुद्र-तट पर उसका पड़ाव » श्लोक 46-48 |
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| | | | श्लोक 6.4.46-48  | अनुवाति शिवो वायु: सेनां मृदुहित: सुख:॥ ४६॥
पूर्णवल्गुस्वराश्चेमे प्रवदन्ति मृगद्विजा:।
प्रसन्नाश्च दिश: सर्वा विमलश्च दिवाकर:॥ ४७॥
उशना च प्रसन्नार्चिरनु त्वां भार्गवो गत:।
ब्रह्मराशिर्विशुद्धश्च शुद्धाश्च परमर्षय:।
अर्चिष्मन्त: प्रकाशन्ते ध्रुवं सर्वे प्रदक्षिणम्॥ ४८॥ | | | | | | अनुवाद | | 'देखो, सेना के पीछे शीतल, मंद, कल्याणकारी और सुखद वायु बह रही है । ये पशु-पक्षी अपनी मधुर वाणी में बोल रहे हैं । समस्त दिशाएँ प्रसन्न हैं । सूर्यदेव निर्मल दिखाई दे रहे हैं । भृगुपुत्र शुक्र भी तुम्हारे पीछे की दिशा में अपनी तेजस्विता से प्रकाशित हो रहे हैं । जहाँ सप्तर्षियों का समूह शोभायमान है, वहाँ वह ध्रुव तारा भी निर्मल दिखाई दे रहा है । समस्त शुद्ध और तेजस्वी सप्तर्षि ध्रुव को अपने दाहिनी ओर रखकर उसकी परिक्रमा करते हैं ॥ 46-48॥ | | | | ‘Look, behind the army, a cool, slow, beneficial and pleasant breeze is blowing. These animals and birds are speaking in their own sweet voices. All directions are happy. The Sun God is appearing clear. The son of Bhrigu, Venus is also shining with its bright radiance in the direction behind you. Where the group of Saptarishis looks beautiful, that Dhruv Tara is also appearing clear. All the pure and bright Saptarishis keep Dhruv on their right and revolve around him.॥ 46-48॥ | | ✨ ai-generated | | |
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