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श्लोक 6.4.44-46h  |
हृतामवाप्य वैदेहीं क्षिप्रं हत्वा च रावणम्॥ ४४॥
समृद्धार्थ: समृद्धार्थामयोध्यां प्रतियास्यसि।
महान्ति च निमित्तानि दिवि भूमौ च राघव॥ ४५॥
शुभानि तव पश्यामि सर्वाण्येवार्थसिद्धये। |
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| अनुवाद |
| 'रघुनंदन! मैं पृथ्वी और आकाश में अनेक शुभ शकुन देख रहा हूँ। ये सभी आपकी मनोकामनाओं की सिद्धि का संकेत दे रहे हैं। इनसे यह निश्चित है कि आप शीघ्र ही रावण का वध करके सीता को पुनः प्राप्त करेंगे और अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर समृद्ध अयोध्या को लौटेंगे।' |
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| ‘Raghunandan! I see many good omens on earth and in the sky. All these indicate the success of your wishes. It is certain from these that you will soon kill Ravana and get Sita back and after your wishes are fulfilled, you will return to the prosperous Ayodhya. 44-45 1/2. |
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