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श्लोक 6.39.28  |
तां रत्नपूर्णां बहुसंविधानां
प्रासादमालाभिरलंकृतां च।
पुरीं महायन्त्रकवाटमुख्यां
ददर्श रामो महता बलेन॥ २८॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार श्री रघुनाथजी ने अपनी विशाल सेना के साथ उस अद्भुत नगर को देखा, जो नाना प्रकार के रत्नों से युक्त, नाना प्रकार की रचनाओं से सुशोभित, ऊँचे-ऊँचे महलों की पंक्ति से सुशोभित और बड़े-बड़े यंत्रों से युक्त सुदृढ़ द्वारों से युक्त था॥ 28॥ |
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| In this manner, Sri Raghunath, along with his large army, saw that wonderful city, filled with various kinds of gems, decorated with various kinds of creations, adorned with a row of tall palaces and having strong doors fitted with large machines.॥ 28॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे एकोनचत्वारिंश: सर्ग: ॥ ३ ९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें उन्तालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३ ९॥ |
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