श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 38: श्रीराम का प्रमुख वानरों के साथ सुवेल पर्वत पर चढ़कर वहाँ रात में निवास करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  6.38.5 
येन धर्मो न विज्ञातो न वृत्तं न कुलं तथा।
राक्षस्या नीचया बुद्धॺा येन तद् गर्हितं कृतम्॥ ५॥
 
 
अनुवाद
जिसने न धर्म को समझा है, न आचार को समझा है और न अपने कुल का विचार किया है; केवल अपनी राक्षसी-सी तुच्छ बुद्धि के कारण ही उसने ऐसे निन्दनीय कर्म किए हैं॥5॥
 
He who has neither understood Dharma nor understood moral conduct nor thought about his family; only due to his demoniac-like low intellect he has committed such condemnable deeds.॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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