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श्लोक 6.37.23  |
अत्र मन्युर्न कर्तव्य: कोपये त्वां न भीषये।
समर्थो ह्यसि वीर्येण सुराणामपि निग्रहे॥ २३॥ |
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| अनुवाद |
| मैंने जो शक्ति तुम्हें बताई है, उसके कारण तुम्हें न तो मुझ पर क्रोध करना चाहिए और न ही द्वेष करना चाहिए। मैं तुम्हें भयभीत नहीं कर रहा हूँ, अपितु शत्रुओं पर तुम्हारा क्रोध भड़का रहा हूँ; क्योंकि तुम अपने बल और पराक्रम से देवताओं को भी वश में करने में समर्थ हो।॥ 23॥ |
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| ‘You should neither feel humbled nor angry with me for the power I have described to you. I am not frightening you, but provoking your anger against the enemy; because you are capable of subduing even the gods by your strength and valour.॥ 23॥ |
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