श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 37: विभीषण का श्रीराम से लङ्का की रक्षा के प्रबन्ध का वर्णन तथा श्रीराम द्वारा लङ्का के विभिन्न द्वारों पर आक्रमण करने के लिये अपने सेनापतियों की नियुक्ति  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  6.37.23 
अत्र मन्युर्न कर्तव्य: कोपये त्वां न भीषये।
समर्थो ह्यसि वीर्येण सुराणामपि निग्रहे॥ २३॥
 
 
अनुवाद
मैंने जो शक्ति तुम्हें बताई है, उसके कारण तुम्हें न तो मुझ पर क्रोध करना चाहिए और न ही द्वेष करना चाहिए। मैं तुम्हें भयभीत नहीं कर रहा हूँ, अपितु शत्रुओं पर तुम्हारा क्रोध भड़का रहा हूँ; क्योंकि तुम अपने बल और पराक्रम से देवताओं को भी वश में करने में समर्थ हो।॥ 23॥
 
‘You should neither feel humbled nor angry with me for the power I have described to you. I am not frightening you, but provoking your anger against the enemy; because you are capable of subduing even the gods by your strength and valour.॥ 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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