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ramayan 6.35.8: जो आवश्यकता पड़ने पर शत्रुओं से संधि और युद्ध करता है और अपने पक्ष की वृद्धि में लगा रहता है, वह महान् कल्याण प्राप्त करता है ॥8॥   |   ramayan सर्ग 6.35: माल्यवान् का रावण को श्रीराम से संधि करने के लिये समझाना   ।   ramayan काण्ड 6: युद्ध काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 35: माल्यवान् का रावण को श्रीराम से संधि करने के लिये समझाना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  6.35.8 
संदधानो हि कालेन विगृह्णंश्चारिभि: सह।
स्वपक्षे वर्धनं कुर्वन्महदैश्वर्यमश्नुते॥ ८॥
 
 
अनुवाद
जो आवश्यकता पड़ने पर शत्रुओं से संधि और युद्ध करता है और अपने पक्ष की वृद्धि में लगा रहता है, वह महान् कल्याण प्राप्त करता है ॥8॥
 
He who, when required, enters into a treaty and war with his enemies and remains engaged in the growth of his own side, attains great prosperity. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)