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श्लोक 6.34.4  |
नहि मे क्रममाणाया निरालम्बे विहायसि।
समर्थो गतिमन्वेतुं पवनो गरुडोऽपि वा॥ ४॥ |
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| अनुवाद |
| 'यहाँ तक कि वायु या गरुड़ भी आधारहीन आकाश में तीव्र गति से चलने वाली मेरी गति का अनुसरण करने में समर्थ नहीं हैं।' |
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| ‘Even the wind or Garuda is not capable of following my movement moving at a great speed in the baseless sky.’ |
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