श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 6: युद्ध काण्ड  »  सर्ग 34: सीता के अनुरोध से सरमा का उन्हें मन्त्रियों सहित रावण का निश्चित विचार बताना  »  श्लोक 25-26h
 
 
श्लोक  6.34.25-26h 
तदेषा सुस्थिरा बुद्धिर्मृत्युलोभादुपस्थिता।
भयान्न शक्तस्त्वां मोक्तुमनिरस्त: स संयुगे॥ २५॥
राक्षसानां च सर्वेषामात्मनश्च वधेन हि।
 
 
अनुवाद
रावण के सिर पर काल नाच रहा है। इसलिए उसके मन में मृत्यु का लोभ उत्पन्न हो गया है। इसीलिए उसका मन तुम्हें न लौटने देने के निश्चय पर दृढ़ हो गया है। जब तक वह युद्ध में राक्षसों के विनाश और अपनी मृत्यु से नष्ट न हो जाए, तब तक वह तुम्हें केवल डराकर नहीं छोड़ सकता।॥25 1/2॥
 
‘Death is dancing on Ravan's head. Therefore, greed for death has arisen in his mind. This is the reason why his mind has become firm on the determination of not letting you return. Unless he is destroyed in the war by the destruction of the demons and his own death, he cannot release you merely by scaring you.॥ 25 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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