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श्लोक 6.34.17  |
तां तु सीता पुन: प्राप्तां सरमां प्रियभाषिणीम्।
परिष्वज्य च सुस्निग्धं ददौ च स्वयमासनम्॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| तब सीता ने बड़े स्नेह से लौटी हुई प्रियतम सरमा को गले लगाया और बैठने के लिए आसन देकर कहा -॥17॥ |
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| Then Sita embraced the beloved Sarma who had returned with great affection and offered her a seat to sit and said -॥ 17॥ |
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